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Bihar News: 30 दिनों में शिकायतों का निपटारा नहीं करने वाले अधिकारियों पर होगी कार्रवाई, सम्राट चौधरी सरकार के सख्त निर्देश

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बिहार सरकार ने आम जनता की शिकायतों के त्वरित समाधान को लेकर बड़ा फैसला लिया है। 30 दिनों के भीतर मामलों का निपटारा नहीं होने पर जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों पर निलंबन और अनुशासनिक कार्रवाई की जाएगी।

पटना/आलम की खबर:बिहार में आम लोगों की समस्याओं के त्वरित समाधान को लेकर राज्य सरकार अब पूरी तरह सख्त मोड में दिखाई दे रही है। सरकार ने साफ कर दिया है कि जनता से जुड़े मामलों में किसी प्रकार की लापरवाही अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी। खासकर जमीन विवाद, राजस्व न्यायालय से जुड़े मामले, सरकारी योजनाओं की शिकायतें और प्रखंड स्तर पर लंबित आवेदन अब अधिकारियों की जवाबदेही तय करेंगे। राज्य सरकार ने निर्देश दिया है कि आवेदन मिलने के 30 दिनों के भीतर यदि समस्या का समाधान नहीं हुआ तो संबंधित अधिकारी और कर्मचारियों पर निलंबन तथा अनुशासनिक कार्रवाई की जाएगी।

सरकार की ओर से जारी इस नई व्यवस्था को प्रशासनिक सुधार की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। लंबे समय से आम लोगों की शिकायत रही है कि सरकारी दफ्तरों में आवेदन देने के बावजूद महीनों तक सुनवाई नहीं होती, फाइलें दबाकर रख दी जाती हैं और लोगों को लगातार कार्यालयों का चक्कर लगाना पड़ता है। अब सरकार इसी व्यवस्था को बदलने के लिए जिलों से लेकर पंचायत स्तर तक विशेष निगरानी तंत्र तैयार कर रही है।

सामान्य प्रशासन विभाग के अपर मुख्य सचिव डॉ. बी. राजेन्दर ने इस संबंध में सभी विभागों के सचिवों, प्रमंडलीय आयुक्तों, जिलाधिकारियों और पुलिस अधीक्षकों को विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं। सरकार ने स्पष्ट कहा है कि सहयोग शिविरों को केवल औपचारिकता नहीं बनाया जाए बल्कि इन्हें जनता की समस्याओं के वास्तविक समाधान का माध्यम बनाया जाए। इसके लिए हर जिले में लंबित मामलों की समीक्षा करने का आदेश दिया गया है।

राजस्व न्यायालयों में लंबित मामलों को लेकर सरकार ने विशेष चिंता जताई है। कई जिलों में वर्षों से भूमि विवाद और दाखिल-खारिज से जुड़े मामले लंबित पड़े हैं, जिससे आम लोगों को भारी परेशानी उठानी पड़ रही है। सरकार ने निर्देश दिया है कि जिन पंचायतों में सहयोग शिविर प्रस्तावित हैं, वहां से जुड़े सभी लंबित मामलों की लगातार सुनवाई कर शिविर की तिथि से पहले निष्पादन सुनिश्चित किया जाए। ताकि शिविर के दिन संबंधित पक्षों को फैसले की जानकारी दी जा सके और लोगों को तत्काल राहत मिले।

सरकार का मानना है कि जमीन विवाद और प्रशासनिक देरी कई बार सामाजिक तनाव और आपसी विवाद की बड़ी वजह बनते हैं। ऐसे मामलों का समय पर समाधान होने से गांवों और कस्बों में शांति और सौहार्द का माहौल बनेगा। यही कारण है कि इस बार प्रशासनिक मशीनरी को सीधे जवाबदेह बनाया गया है। अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया गया है कि मामलों को सिर्फ कागजों पर बंद न किया जाए बल्कि वास्तविक समाधान सुनिश्चित किया जाए।

जिलाधिकारियों को विशेष रूप से यह जिम्मेदारी दी गई है कि वे शिविरों में प्राप्त आवेदनों की निष्पक्ष समीक्षा करें। जिन मामलों में बिना उचित कार्रवाई के आवेदन का निस्तारण दिखा दिया गया है, वहां संबंधित पदाधिकारियों के खिलाफ अनुशासनिक कार्रवाई की अनुशंसा की जाएगी। यानी अब केवल फाइल क्लोज करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि शिकायतकर्ता की संतुष्टि भी जरूरी होगी।

सरकार ने निगरानी की प्रक्रिया को और मजबूत बनाने के लिए गोपनीय शाखा के जरिए शिकायतकर्ताओं से सीधे फीडबैक लेने का निर्देश भी दिया है। जिलाधिकारी यह सुनिश्चित करेंगे कि कुछ आवेदकों को फोन कर पूछा जाए कि उनकी समस्या का सही समाधान हुआ या नहीं। यदि शिकायतकर्ता असंतोष जताता है तो उस मामले की फिर से समीक्षा की जाएगी और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की जाएगी। इससे प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़ने की उम्मीद है।

सरकार ने यह भी निर्देश दिया है कि सहयोग शिविरों में जिले के सांसद, विधायक और जिला एवं प्रखंड बीस सूत्री समिति के सदस्यों को भी आमंत्रित किया जाए। इसका उद्देश्य यह है कि जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी में समस्याओं का निष्पक्ष समाधान हो और जनता को यह भरोसा मिले कि सरकार उनकी शिकायतों को गंभीरता से सुन रही है। प्रशासनिक अधिकारियों के साथ जनप्रतिनिधियों की भागीदारी से निगरानी व्यवस्था भी मजबूत होगी।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 30 दिनों की समयसीमा को लेकर सरकार ने जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई है। यदि किसी आवेदन का निपटारा निर्धारित समय के भीतर नहीं हुआ तो प्रखंड स्तर के जिम्मेदार अधिकारी पर निलंबन और अनुशासनिक कार्रवाई होगी। साथ ही उस कार्य में सहयोग करने वाले अधीनस्थ कर्मचारियों की भी जवाबदेही तय की जाएगी। इससे स्पष्ट संकेत गया है कि अब केवल बड़े अधिकारियों ही नहीं बल्कि नीचे तक की पूरी प्रशासनिक श्रृंखला को जवाबदेह बनाया जाएगा।

प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि यदि यह व्यवस्था जमीन पर प्रभावी तरीके से लागू हुई तो बिहार में सरकारी कामकाज की तस्वीर बदल सकती है। आमतौर पर शिकायत निवारण की प्रक्रिया लंबी और जटिल मानी जाती है, लेकिन समयबद्ध समाधान से लोगों का सरकारी व्यवस्था पर भरोसा बढ़ेगा। खासकर ग्रामीण इलाकों में जहां लोग छोटी-छोटी समस्याओं को लेकर महीनों तक दफ्तरों के चक्कर काटते हैं, वहां यह अभियान बड़ी राहत साबित हो सकता है।

राज्य सरकार इस पहल को केवल एक प्रशासनिक अभियान नहीं बल्कि सुशासन मॉडल के रूप में प्रस्तुत करना चाहती है। सरकार का मानना है कि यदि जनता की शिकायतों का त्वरित समाधान होगा तो सामाजिक तनाव कम होगा, भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा और आम लोगों को न्याय मिलने की प्रक्रिया तेज होगी। यही वजह है कि अधिकारियों को लगातार निर्देश जारी किए जा रहे हैं और जिलों से रिपोर्ट मांगी जा रही है।

अब देखने वाली बात होगी कि सरकार के ये सख्त निर्देश जमीन पर कितना असर दिखाते हैं। क्योंकि बिहार में पहले भी कई बार समयबद्ध शिकायत निवारण की बातें हुईं, लेकिन निचले स्तर पर लापरवाही और फाइलों की धीमी रफ्तार के कारण लोगों को अपेक्षित राहत नहीं मिल पाई। इस बार सरकार ने सीधे निलंबन और अनुशासनिक कार्रवाई का प्रावधान कर स्पष्ट संकेत दे दिया है कि जनता की समस्याओं को नजरअंदाज करने वालों को अब बख्शा नहीं जाएगा।

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